

हाल ही में केंद्र सरकार ने स्पेक्ट्रम ट्रेडिंग की अनुमति देने के साथ ही इसके लिए दिशानिर्देश भी जारी किए हैं। इसके तहत टेलीकॉम सर्विस प्रदाता कंपनियां एक-दूसरे से अपनी आवश्यकतानुसार स्पेक्ट्रम की खरीद-बिक्री कर सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार ला सकेंगी। इससे महंगे स्पेक्ट्रम का अधिकतम उपयोग हो सकेगा और कॉल ड्रॉप की समस्या से बहुत हद तक राहत मिलेगी। अभी तक टेलीकॉम कंपनियां केवल नीलामी के जरिये ही स्पेक्ट्रम हासिल कर सकती थीं।
स्पेक्ट्रम क्या है?
मोबाइल फोन आने से पहले देश में पहले 'स्पेक्ट्रम' शब्द का इस्तेमाल इंद्रधनुष के रंगों के लिए ही किया जाता था। स्पेक्ट्रम से हमारा सामना प्रतिदिन होता है, फिर चाहे वह टीवी का रिमोट हो या माइक्रोवेव ओवन या फिर धूप। आखिर यह स्पेक्ट्रम है क्या? और कैसे इस वैज्ञानिक अवधारणा को लेकर सरकारी और कारोबारी फैसले से हमारे और आपके जीवन, जनोपयोगी सेवाओं और लागत पर असर पड़ता है।
स्पेक्ट्रम, 'इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम' का लघु रूप है। स्पेक्ट्रम उस विकिरण ऊर्जा को कहते हैं, जो पृथ्वी को घेरे रहती है। इस इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन (ईएमआर-Electro Magnetic Radiation) का मुख्य स्रोत सूर्य है। साथ ही, यह ऊर्जा तारों और आकाशगंगाओं से तथा पृथ्वी के नीचे दबे रेडियोएक्टिव तत्वों से भी मिलती है।
ईएमआर का एक रूप दिखाई देने वाली रोशनी है, जबकि दूसरा रूप रेडियो फ्रीक्वेंसी (आरएफ-Radio Frequency) स्पेक्ट्रम होता है।
ईएमआर में इन्फ्रारेड और अल्ट्रावॉयलेट किरणों जैसी कई दूसरे प्रकार और असर वाली वेवलेंथ (तरंगदैर्घ्य) भी होती हैं।
हर देश को एक समान ही आरएफ स्पेक्ट्रम मिलता है।
एक वेव या तरंग की लंबाई, उसकी फ्रीक्वेंसी (वेवलेंथ या साइकल प्रति सेकंड) और उसकी ऊर्जा से इसका इस्तेमाल तय होता है।
रेडियो वेव तुलनात्मक रूप से काफी लंबे होते हैं। इनकी वेवलेंथ 1 किलोमीटर से लेकर 10 सेंटीमीटर तक की होता है। इसकी फ्रीक्वेंसी भी 3 किलोहर्ट्ज़ (3,000 साइकिल प्रति सेकंड) से लेकर 3 गीगाहर्ट्ज़ (3 अरब साइकिल प्रति सेकेंड) तक के बीच होती है। इसे माइक्रोवेव्स के नाम से भी जाना जाता है।
सेंटीमीटर और मिलीमीटर की रेंज वाले माइक्रोवेव्स की फ्रीक्वेंसी 300 गीगाहर्ट्ज़ तक हो सकती है। इसके अलग-अलग प्रकार के इस्तेमाल को देखते हुए इसे अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। खाना पकाने वाले माइक्रोवेव में सैकड़ों वॉट बिजली का इस्तेमाल आरएफ वेवलेंथ को उत्पन्न करने में होता है।
ये वेवलेंथ 32 सेमी (915 मेगाहर्ट्ज़) से लेकर 12 सेमी (2.45 मेगाहर्ट्ज़) तक के होते हैं। छोटी ऊर्जा स्रोतों वाले उपकरणों से पैदा होने वाले माइक्रोवेव का इस्तेमाल संचार के साधनों के रूप में होता है और ये काफी कम ऊर्जा पैदा करते हैं।
इन्फ्रारेड वेव छोटी होती हैं और वे काफी गर्म होती हैं। लंबी दूरी वाले इन्फ्रारेड बैंड्स का इस्तेमाल रिमोट कंट्रोल के लिए होता है। इनका इस्तेमाल बहुत कम गर्मी पैदा करने वाले बल्बों में भी होता है।
700-400 नैनोमीटर के वेवलेंथ (करीब 430-750 टेराहर्ट्ज़) का इस्तेमाल सफेद रोशनी उत्पन्न करने के लिए होता है।
छोटी वेवलेंथ से अल्ट्रावॉयलेट किरणों का निर्माण होता है, जो मनुष्य को हानि पहुंचा सकती हैं। समुद्र के किनारे की धूप में 53 प्रतिशत इन्फ्रारेड, 44 प्रतिशत दिखाई देने वाली रोशनी और 3 प्रतिशत अल्ट्रावॉयलेट किरणें होती हैं।
कुछ छोटी वेव को एक्स-रे कहते हैं और सबसे छोटी वेव को गामा किरणें कहते हैं, जिनका इस्तेमाल चिकित्सा और उद्योगों में होता है।
आरएफ स्पेक्ट्रम का सबसे लाभप्रद इस्तेमाल दूरसंचार और इंटरनेट में होता है। दूरसंचार और ब्रॉडबैंड के लिए 700-900 मेगाहर्ट्ज़ की छोटी फ्रीक्वेंसी काफी फायदेमंद होती हैं। इससे बिना किसी कठिनाई के लंबी दूरी तय की जा सकती हैं।
रेडियो तरंगें भाप और आयन से सर्वाधिक प्रभावित होती हैं। इन पर सूर्य की चमक (सोलर फ्लेयर) और एक्सरे किरणों के विस्फोट का भी असर होता है।
पहाड़ों की वजह से भी रेडियो तरंगों से संचार में काफी असर पड़ता है। छोटी फ्रीक्वेंसी मकानों और पेड़ों को भी पार कर सकती हैं तथा ये पहाड़ों के किनारे से भी निकल सकती हैं।
बड़ी फ्रीक्वेंसी को वातावरण वापस प्रतिबिंबित या सोख सकता है। उन पर दूरी और वर्षा का भी असर होता है।
छोटी फ्रीक्वेंसी के नेटवर्क के लिए ज्यादा टावरों की जरूरत होती है।
2जी-3जी-4जी या 5-जी
ये सभी मोबाइल फोन में तकनीकी विकास के अलग-अलग चरण हैं।
1जी के एनालॉग वायरलेस की शुरुआत 1980 के दशक में हुई थी, जिसका इस्तेमाल कार फोन में होता था।
2जी 1990 के दशक में जीएसएम को अपने साथ लेकर आया आया और इसके साथ सीडीएमए भी आया।
भारत में 2008 में शुरू हुए 3जी में डाटा का हस्तांतरण तेजी से होता है और
वर्ष 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होकर नया राज्य तेलंगाना बना था। इसके बाद आंध्र प्रदेश के पास अपनी राजधानी का संकट आ गया क्योंकि हैदराबाद तेलंगाना के हिस्से में चला गया था। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने किसी शहर को राजधानी के तौर पर चुनने के बजाय एक नई राजधानी बसाने का निर्णय किया जिसे अमरावती का नाम दिया गया। 22 अक्टूबर को इस नए शहर का शिलान्यास किया गया। इस अवसर पर आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी भाग लिया। नई राजधानी अमरावती आंध्र प्रदेश के दो बड़े शहरों गुंटूर और विजयवाड़ा के बीच में बनेगी। गुंटूर से इसकी दूरी 36 किलोमीटर और विजयवाड़ा से करीब 19 किलोमीटर है।
अमरावती को आधुनिक शहर बनाने में सिंगापुर और जापान मदद कर रहे हैं
यह देश की पहली स्मार्ट सिटी होगी जिसका मास्टर प्लान स्वयं सिंगापुर सरकार ने डिज़ाइन किया है।
अमरावती आकार में सिंगापुर से 10 गुना और चेन्नई से 6 गुना बड़ी होगी. इसका निर्माण पीपीपी के आधार पर किया जाएगा.
इस स्मार्ट सिटी में 4 राष्ट्रीय जलमार्ग, एक हवाई अड्डा, चार हाई स्पीड रेल कॉरिडोर, बस रैपिड ट्रांज़िट और मेट्रो रेल नेटवर्क प्रस्तावित हैं। केंद्र अमरावती के लिए 26 किमी. मेट्रो परियोजना को मंजूरी देने के अलावा 210 किमी. लंबे रिंग रोड को भी मंजूरी दे चुका है.
इसके अलावा जापान और आंध्र प्रदेश ने 23 अक्टूबर को राजधानी अमरावती के विकास लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए. जापान बैंक फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन और आन्ध्र प्रदेश सरकार के भीच यह समझौता हुआ है.
अमरावती देश में पांचवीं नियोजित राजधानी होगी. गांधीनगर (गुजरात), चंडीगढ़ (हरियाणा और पंजाब की संयुक्त राजधानी), भुवनेश्वर (ओडिशा) तथा नया रायपुर (छतीसगढ़) अन्य चार में शामिल हैं.
अमरावती कृष्णा नदी के किनारे पर है और देश के उन कुछ स्थानों में से एक है जहां नदी के बहाव की दिशा उत्तर की ओर है (अधिकांश नदियों का बहाव दक्षिण या पूर्व की दिशा में होता है)।
ऐतिहासिक महत्व के कारण नई राजधानी को अमरावती नाम दिया गया; लगभग 1800 वर्ष पूर्व अमरावती सातवाहन वंश के राजाओं की राजधानी भी रह चुकी है।
नई राजधानी के लिए भूमि अधिग्रहण
आंध्र प्रदेश सरकार के पास 22 हज़ार एकड़ ज़मीन थी; लगभग 32 हज़ार एकड़ ज़मीन की और ज़रूरत थी।
नई राजधानी के लिए विजयवाड़ा और गुंटूर के बीच 30 गांवों की 32 हज़ार एकड़ ज़मीन को चुना गया।
नई राजधानी की ज़मीन के लिए सरकार ने अधिग्रहण के बजाय लैंड पूलिंग की नीति बनाई।
32 हज़ार एकड़ ज़मीन 18 हज़ार किसानों से ली गई जिसके बदले में उन्हें बेहतर मुआवज़ा मिला
मुआवज़े में हर किसान को दस वर्ष के लिए प्रति एकड़ 50 हज़ार रुपये मिलेंगे।
इसके अलावा हर किसान को 1000 वर्ग गज का पूर्ण विकसित आवासीय भूखंड भी मिलेगा।
किसान को 200 से 300 वर्ग गज का एक व्यावसायिक भूखंड भी मिलेगा।
किसानों से ली गई ज़मीन का 50 प्रतिशत हिस्सा अवसंरचनात्मक ढांचा बनाने में इस्तेमाल होगा। 25 प्रतिशत हिस्सा ज़मीन देने वाले किसानों को एक प्रकार से लौटा दिया जाएगा; शेष 25 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार अन्य कार्यों के लिए इस्तेमाल करेगी।
इसके अलावा, प्रधानमंत्री ने तिरूपति हवाई अड्डे पर गरूड़ टर्मिनल का उद्घाटन तथा तिरूपति में ही वेंकटेश्वर मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण केन्द्र की आधारशिला भी रखी। यह देश का पहला मोबाइल विनिर्माण हब होगा, जहाँ शिओमी, जियोनी सहित कई कम्पनियां अपनी विनिर्माण इकाई लगाएंगी. इससे एक वर्ष में 10 हजार लोगों को रोजगार मिलने का अनुमान है.
बैंक ऑफ बड़ौदा की दिल्ली स्थित अशोक विहार शाखा पर फर्जी आयात के भुगतान के नाम पर लगभग 6,000 करोड़ रुपये के धनशोधन का आरोप लगा है। सीबीआई के मुताबिक इस काले धन को 59 खाताधारक कंपनियों की मदद से हांगकांग हस्तांतरित किया गया। इन खाताधारक कंपनियों द्वारा बैंक में दर्ज कराये गये ज्यादातर पते फर्जी निकले। सीबीआई ने बैंक आफ बड़ौदा की शिकायत पर 59 खाताधारकों व अज्ञात बैंक अधिकारियों व निजी व्यक्तियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा के तहत मामला दर्ज किया है। एफआईआर में आरोप लगाया गया है कि 59 चालू खाताधारकों एवं अज्ञात बैंक अधिकारियों ने करीब 6,000 करोड़ रुपये हांगकांग से काजू, दाल और चावल खरीदने के लिए हांगकांग हस्तांतरित किये।
यह मामला बैंक के आंतरिक अंकेक्षण में उजागर हुआ। अशोक विहार शाखा द्वारा हांगकांग से लेन-देन के 8,000 मामलों की बात सामने आने के बाद बैंक ने यह आंतरिक जांच कराई। जांच में कहा गया है कि हांगकांग के लिए काजू, चावल आदि के आयात के लिए अग्रिम के तौर पर भुगतान किए गए, लेकिन आयात कभी किया ही नहीं गया। बैंक प्रणाली की निगाह से बचने के लिए रकम हमेशा एक लाख डालर से कम भेजी गयी और 59 कंपनियों के खाते फर्जी तरीके से खोलकर उनमें करोड़ों रुपये जमा किये गये, जिसकी कभी रिपोर्ट नियामकीय एजेंसियों को नहीं की गई।
बीते सालों में वेबपोर्टल कोबरा पोस्ट द्वारा खुलासा किया गया था कि सरकारी बैंक भी धनशोधन का काम कर रहे हैं। कोबरा पोस्ट ने अपने दूसरे स्टिंग आपरेशन रेड स्पाइडर पार्ट-2 में उजागर किया कि सार्वजनिक क्षेत्र के 12 बैंक, निजी क्षेत्र के बैंक एवं डीसीबी बैंक और बीमा कंपनियां, भारतीय रिजर्व बैंक, इरडा और दूसरी वित्तीय नियामक एजेंसियां नियमों की अनदेखी करते हुए अपने बिजनेस को नाजायज तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार धनशोधन करने में 10 बैंक और शामिल हैं। इसके पहले इस वेबपोर्टल ने तीन निजी बैंकों में धनशोधन एवं दूसरी गड़बड़ियों का आरोप लगाया था। पोस्ट के मुताबिक धनशोधन के लिए बैंक बेनामी खाते खोलते हैं। खाता खोलने में केवाईसी नियमों की अनदेखी की जाती है। खाते में जमा पैसों को बीमा में निवेश किया जाता है। जबरदस्ती या फिर ग्राहकों को बिना विश्वास में लिये बीमा उत्पादों को बेचा जाता है। काले धन को रियल एस्टेट में भी लगाया जाता है। बेनामी धन को रखने के लिए लॉकर की सुविधा दी जाती है। बिना वित्तीय नियामकों को खबर किए काले धन का हस्तांतरण भी किया जाता है।
आरोप है कि सरकार और विविध नियामक एजेंसियां मामले में लापरवाही बरत रहे हैं। भारतीय रिजर्व बैंक, जो कि एक नियामक एजेंसी है, वह भी उदासीन है। बैंकों द्वारा खुलेआम धनशोधन किया जा रहा है, जो कि धनशोधन निषेध कानून (पीएमएलए) का सीधा-सीधा उल्लंघन है। इस तरह की गतिविधियों की जानकारी बैंकों के शीर्ष प्रबंधन को भी है, लेकिन कुछ बैंक प्रमुखों ने उस समय इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया था। उनके मुताबिक बैंक हमेशा संदिग्ध लेन-देन की जानकारी वित्तीय खुफिया विभाग (एफआईयू) को देता है। एलआईसी प्रमुख का मानना था कि इस तरह की गड़बड़ी नहीं हो सकती क्योंकि पैन नम्बर नहीं होने पर 50000 रुपये से अधिक का लेन-देन संभव नहीं है। मामले की गंभीरता को देखते हुए रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के निर्देशानुसार सरकारी क्षेत्र के बैंकों और एलआईसी एवं दूसरी वित्त एजेंसियों ने 31 कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की थी। 15 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया था, जबकि दूसरे आरोपी कर्मचारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई थी।
दरअसल बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में आज गलाकाट प्रतिस्पर्धा है। इन संस्थानों में ऐसे बजट कर्मचारियों को दिये जाते हैं, जिसे पूरा करना अमूमन संभव नहीं होता। बजट पूरा नहीं करने पर मीटिंगों में अधिकारियों को जलील किया जाता है। कुछ मामलों में ऐसा भी देखा गया है कि कुछ बड़े अधिकारी अपनी प्रोन्नति के लिए डरा-धमका कर अपने अधीनस्थों को बजट पूरा करने के लिए मजबूर करते हैं। हाल में कुछ बैंक अधिकारी बजट पूरा करने के दबाव की वजह से आत्महत्या करने पर भी विवश हुए हैं। दरअसल, बीते सालों में बैंकिंग क्षेत्र में तेजी से प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। सामान्य तौर पर काम की अधिकता, करियर, लालच एवं डर की वजह से बैंक या बीमा कर्मचारी नियामकों द्वारा बनाये गये नियमों की अनदेखी कर रहे हैं, जो कि देश के हित में नहीं है।
बता दें कि किसी भी संस्थान की सबसे बड़ी पूंजी मानव संसाधन को माना गया है। लिहाजा, बैंक प्रबंधन को मामले की तह तक जाना चाहिए। मानव संसाधन स्तर पर नीतिगत बदलाव लाना होगा। साथ ही मुनाफे एवं प्रोन्नति के लिए किसी हद तक जाने की प्रवृत्ति पर लगाम लगानी होगी।
भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग की वार्षिक बैठक में भाग लेने के विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 19-21 अक्टूबर तक तीन दिन की रूस यात्रा की। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रूस के उपप्रधानमंत्री दिमित्री रोगोजिन ने इस भारत-रूस अंतर-सरकारी परामर्श बैठक की संयुक्त रूप से अध्यक्षता की।
भारत और रूस के बीच अंतर-सरकारी आयोग की बैठक प्रत्येक वर्ष आयोजित की जाती है।
दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की सह-अध्यक्षता में होने वाली यह 21वें दौर की बैठक थी।
अंतर-सरकारी आयोग की बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल की प्रमुख और भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पिछले कई दशकों के दौरान अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में रूस के साथ भारत के सफलतापूर्वक सहयोग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि रूस के साथ हमारी अद्वितीय रणनीतिक साझेदारी की शक्ति समय की प्रत्येक कसौटी पर खरी उतरी है।
दोनों देश विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग को गहरा बना रहे हैं और इसका विस्तार कर रहे हैं।
भारत और रूस परमाणु ऊर्जा, रक्षा और अंतरिक्ष अनुसंधान जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग के स्वाभाविक भागीदार हैं।
इसके अलावा, रूस प्रौद्योगिकी, मशीनरी, उपकरणों के निर्माण और तकनीकी जानकारियों के एक स्रोत के रूप में भारत के विकास की प्रक्रिया में एक और भी बड़ा भागीदार बन सकता है।
भारत और रूस ने अगले 10 साल में 30 अरब डॉलर के द्विपक्षीय कारोबार का लक्ष्य हासिल करने के लिए अपने आर्थिक संबंधों को मजबूत बनाने के उपायों पर चर्चा की।
दोनों देशों ने 2025 तक द्विपक्षीय प्रत्यक्ष निवेश बढ़ाकर 15 अरब डॉलर करने के उपायों पर चर्चा करते हुए इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों की पहचान की।
दोनों देशों के बीच 2014 में द्विपक्षीय व्यापार 9.51 अरब डॉलर था। इसमें भारत का निर्यात 3.17 अरब डॉलर और आयात 6.34 अरब डॉलर था।
कृषि, औषधि तथा बुनियादी ढांचा जैसे कुछ क्षेत्रों की पहचान की गई है जिनमें दोनों पक्ष पारस्परिक सहयोग संपर्क तेज करेंगे।
रूस और भारत आपसी व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग का विस्तार करना चाहते हैं। राष्ट्रीय मुद्राओं के उपयोग से द्विपक्षीय व्यापार का विस्तार होगा क्योंकि मुद्राओं की विनिमय-दरों में उतार चढ़ाव का इस पर बुरा असर नहीं होगा। उद्यमियों के लिए भी यह सुविधाजनक होगा क्योंकि उन्हें इससे विनिमय-लागत से छुटकारा मिल जाएगा।
रूस ने कहा कि वह परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग, ताप बिजलीघरों, धातु व मशीन-निर्माण उद्योगों के उन्नयन, खनिज-पदार्थों की खोज, गैस-पाइपलाइनें, बिजली की लाइनें बिछाने, रेलवे के बुनियादी ढांचे के विकास, विमान व हेलीकाप्टर निर्माण, बाह्य अंतरिक्ष में अनुसंधान, संचार के आधुनिक साधनों के विकास, 'स्मार्ट सिटी' के निर्माण, औद्योगिक सुविधाओं के निर्माण, जल उपचार की आधुनिक प्रणालियों की स्थापना और विशेषज्ञों को प्रशिक्षण देने के कार्यों में भारत की सहायता करने को तैयार है। रूस और भारत के बीच परमाणु ऊर्जा, सैन्य-तकनीकी क्षेत्र, ऊर्जा के परंपरागत क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी आदि के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा सकता है।